शराफत पर कविता,sharafat - Zindgi ek kavita

शराफत पर कविता,sharafat

जिंदगी एक कविता

जिंदगी एक कविता

गुरुर ज्यादा न दिखाओ,हुजूर इतने अदब से
हमें शरीफियत की कोई आदत नही है।
बेशक तुम होंगे भले आदम सरी के ,
हमें आदमियत की पर कोई आदत नही है।
लाख होंगे तेरे आशिक तेरी गली में,
तलब इतनी भी मुझको तेरी बेशक नही है
बना सके मुझे जो तलबगार इश्क का,
तेरी मोहब्बत की इतनी हैसियत नही है।
माना बख्शा है खुदा ने तुझे, हुस्न भर भर के
पर जरा सी भी तुझमें,इंसानियत नही है।
बस मान लो इसे भी एक ख्वाब अधूरा सा, 
मुकम्मल नही है इसमें असलियत नही है।
खुद से भी बढ़कर जो चाहे यार को अपने
इस बात में जरा भी हकीकत नही है,
देखा है हश्र हमने भी इतिहास में सभी का
सच्चे प्यार की दुनिया में कोई कीमत नहीं है।
@साहित्यगौरव

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