शिव, shiv
महरूम न रख बाबा,तू मुझे अपने करम से,
तेरे दर्शन को कबसे,अधूरी आस बाकी है।
रह सी गई है जो अब आखिरी ख्वाहिश सी,
शिव दरबार में मेरी भी,तो अरदास बाकी है।
माना तू बसा है जग के कण कण में,भोले,
तेरे भक्तों को फिर भी,तेरी तलाश बाकी है।
अब तो बुला ले महाकाल, मुझे शरण में
अंधकार में डूबा हूं,तेरा ही प्रकाश बाकी है।
रह सी गई हो जो अब आखिरी ख्वाहिश सी
शिव दरबार में मेरी भी,तो अरदास बाकी है।
थोड़ा ही सही तू करम मुझ पर भी कर दे,
बची है जो कबसे,थोड़ी ही सास बाकी है।
दीदार को तेरे जो कबसे तरस गई है,
इन आंखो को तेरे दर्शन,की प्यास बाकी है।
रह सी गई हो जो अब आखिरी ख्वाहिश सी
शिव दरबार में मेरी भी, तो अरदास बाकी है।
@गौरव


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