बेरोजगारी पर कविता poem on unemployment - Zindgi ek kavita

बेरोजगारी पर कविता poem on unemployment

बेरोजगार/berojgar
जिंदगी एक कविता

जिंदगी एक कविता


न लिखूं कुछ कैसे भला,ये कर्ज़ बाजारी देखकर,
झकझोर देती है कलम भी,इनकी लाचारी देखकर।

चुनावी वादों के पर्चों सी,हालत सरकारी देखकर,
दवाग्नल सी जो भड़की जाए,बेरोजगारी देखकर।

@साहित्य गौरव


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