कलम से नमन
हिफाजत से रखना दोस्तों मेरे वतन को,
मैं अपना फर्ज निभाकर चला हूं।
तिरंगे की आन में जो बचा रक्खा था थोड़ा,
अपने हिस्सें का लहू मैं बहाकर चला हूं।
बेशक होंगे कई देश में,मौका परस्त भी लेकिन
वतन परस्ती की राह उनको दिखाकर चला हूं,
आयेंगे मेरे बाद भी कई वीर ,वतन पे मरने वाले,
शहीदों में नाम अपना,मैं लिखा कर चला हूं
बुझने न देना साथियों दिया वो शहादत का,
जो कतरे कतरे से, मैं जलाकर चला हूं।
माफ करना न चुका पाया जो कर्ज किसी का,
मातृभूमि का कर्ज तो ,मैं चुकाकर चला हूं।
@साहित्य गौरव

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