उलझन पर कविता, uljhan par kavita - Zindgi ek kavita

उलझन पर कविता, uljhan par kavita

जरा जरा सा उलझ जाओ तुम भी मेरी उलझनों में
कभी कोई उलझन फिर हमें उलझा न सके ....
यूंही रहो उलझी ताउम्र मेरी बाहों में 
कि कभी कोई लम्हा हमे सुलझा न सके।
 

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