कश्मकश kashmakas - Zindgi ek kavita

कश्मकश kashmakas

जिंदगी एक कविता

जिंदगी एक कविता

इसी कशमकश में गुजर जाता है वक्त भी,
जाने कौन गलत है मैं या आखिर वो..
कभी मैं न समझ पाया कभी वो न समझ पाए 
बिखरते हुए रिश्ते में कौन किसको समझाए
गलतफहमियों का दौर भी कितना अजीब है 
इन उलझे हुए हालातों को कोई कैसे सुलझाए
फिर ........
इसी कशमकश में गुजर जाता है वक्त कि 
जाने कौन गलत है मैं या आखिर वो।
कितने अजीब से हालत है कितना अजीब सा दौर है 
शायद मैं गलत हूं या गलत कोई और है 
ऐसा नहीं है की कोशिश नही की मैंने 
वो समझेगा कैसे जब जिसका दिल ही कठोर है
फिर........
इसी कशमकश में गुजर जाता है वक्त कि 
जाने कौन गलत है मैं या आखिर वो।
मेरी कोई गलती नही,शायद मोहब्बत में कमी है
एक अनचाही सी धूल है जो रिश्तों में जमी है
यूं तो है रिश्तेदारी बहुत से मतलबी लोगो से मगर
कैसे कहे किसी को अपना कोई अपना ही नहीं है
फिर ........
इसी कशमकश में गुजर जाता है वक्त कि जाने कौन गलत है मैं या आखिर वो।
किसी ने कहा की रिश्तों को वक्त दो थोड़ा
शायद बदलते वक्त से रिश्ता संभल जाए
मैने कहा ये वक्त कौनसी दवा है
कही मेरा वक्त न बदले और वो ही बदल जाए
फिर ........
इसी कशमकश में गुजर जाता है वक्त कि जाने कौन गलत है मैं या आखिर वो।
@साहित्य गौरव

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