साहब,sahab
इनको जो कभी मिला न हो,उस अधिकार की बात करते हो।।
यहां दबे,कुचले,दलित-निर्धन को,हर रोज दबाया जाता है।
शक्ति और सत्ता के दम पर इनको,अक्सर डराया जाता है।
महिलाओं और पशुओं से अच्छे,व्यवहार की बात करते हो।
हा हा बड़े अजीब हो साहिब तुम-
"जिसकी लाठी उसकी भैंस है", ये सामाजिक दस्तूर पुराना है।
अधिकारों की अब भीख मांगना,भैंस के आगे बीन बजाना है।
सबका साथ और सबका विकास,क्या बेकार की बात करते हो।।
हा हा बड़े अजीब हो साहिब तुम-
@साहित्य गौरव


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