सफर,
परिचय जो करा रहा था
असल जिंदगी से,
ऐसा लग रहा था मानो
नया दौर अधात्म का
शुरू हो गया हो
जैसे आज से अभी से।
चलती हुई ट्रेन में कुछ सज्जन विद्वान से
कर रहे थे,आपस में
धर्म की बातें बड़ी बड़ी सी
किसी ने कहा धर्म ये है किसी ने कहा वो है,
बनते न दिख रही थी
किसी बात पे सहमति भी।
पास की ही सीट पर एक और महाज्ञानी बैठा था,
ईश्वर के अस्तित्व को न माने ऐसे तत्वज्ञानी बैठा था।
उसने उन सज्जन विद्वानों से पूछा
क्या तुमने कभी
ईश्वर को देखा है जो धर्म की बात करते हो,
मूर्ख हो तुम सारे के सारे
जिसका जग में है नही
उस अज्ञात तत्व के अस्तित्व की
बात करते हो।
तैश में आकर एक विद्वान फिर बोला तुम क्या जानो
हमारी सनातनी संस्कृति के बारे में,
जिसने रचा है ये ब्रम्हांड
सारा तुझे और मुझको,
उस परब्रह्म सदगुरु की शक्ति के बारे में,
अरे धर्म न होता तो मनुष्य क्या होता,
वन में विचरते जंगली पशु तुल्य होता,
धर्म ही तो है जिसने सभी को
जीना सिखाया है,
तुझे और मुझे इसने मानव बनाया है।
बात सज्जन की सुन कर नास्तिक फिर बोला,
क्या तेरे ईश्वर का कोई शरीर है
कोई आकर है,
या सिर्फ ये कोरी कल्पना
के जैसे ही निराकार है।
पत्थरों को पूजते हो
तुम्हारा कैसा अजीब कर्म है।
जात पात में जो बाटें ईसानियत को हमेशा,
वास्तविकता में तुम्हारा यही धर्म है।
बात थी पते की दोनो की लेकिन
इस सारी बहस का कोई अंत न दिख रहा था।
इस गूढ़ रहस्य को जो सुलझा पाता ,
वहां पर कोई ऐसा संत न दिख रहा था।
पास बैठे एक आम
आदमी से इन्होंने ने पूछा
तुम्ही बताओ हम दोनो में कौन गलत या सही है,
तुम हो कर दो फैसला जो ये धर्म धर्म चिल्लाते है,
जबकि वास्तविकता में कुछ ऐसा है ही नही है।
आम आदमी मुस्कुराया फिर शालीनता से बोला,
दोनो में से कोई न गलत और न कोई सही है।
अपनी अपनी आस्था है ये तो कोई पत्थर को पूजे या
ईश्वर के किसी का आकर ही नही है।
असलियत में इस जग में कर्म ही पूजा कर्म ही धर्म है,
मेरी नजर में माता पिता से बढ़कर कोई ईश्वर नहीं है,
वक्त पर जो भूखे को रोटी खिला दे सही मायने में सच्चा ईश्वर वही है।


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