अन्न दाता
जिंदगी एक कविता
पतली पगडंडियों पे पैरो को जमाए चला है।
मोटी डोरी से बैलों को पिराए चला है।
सर पे सूती का गमछा बांधे हुए किसान,
अपने बक्खर को कांधे पर उठाए चला है।
इंतजार था उसे कबसे इस पहली बारिश का,
बरसती हुई बारिश की बूंदों से नहाए चला है।
चला है अन्न दाता अब अपने खेतों में,
सीना चौड़ा कर,सर गर्व से उठाए चला है।
@साहित्य गौरव


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