सबक पर कविता ,sabak kavita
जिंदगी एक कविता
क्यूं ढूंढू मैं अपनी खुशी,
दूसरों के साथ से,
मैं तो अपने आप से,
यूंही खुश हूं।
खुश होने के मेरे वजह न पूछो कोई
है तो बड़े हिसाब से,
मैं यूंही खुश हूं।
तुम ढूंढते रह जाओगे,खुश होने का तरीका,
क्यूं हो बड़े बेताब से,
मैं यूंही खुश हुं।
जाने दिन रात क्यूं हैं इसी कश्मकश में लोग,
होते है जरा खराब से,
मैं यूंही खुश हुं।
खुद उलझे हुए लोगों से उलझना छोड़ दिया मैंने,
इनके सवाल जवाब से,
मैं यूंही खुश हुं।
मेरी जिंदगी ने मुझे दिया है ये सबक जो मुझको
न मिलेगा किसी किताब से,
मैं यूंही खुश हु।
मुस्कुराने के लिए,एक मुस्कुराहट ही काफी है।
जैसे खिले खिले गुलाब से,
मैं यूं ही खुश हुं।
@साहित्यगौरव


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