जीवन की सीख कविता,jeevan seekh kavita
सीख/seekh
जिंदगी एक कविता
जीवन ही सीखाता है, जीवन जीने का सलीका,
आदमी खुद अपनी गलतियों से सीखता है।
अकसर कुछ लोगो को उनके तजुर्बे सिखाते है,
तो कही कोई अपनी परिस्थितियों से सीखता है।
समझ आ जाती है जब बात आती है खुद पर,
यथार्थ की चक्की में मानव,जो खुद को पीसता है।
दूसरों को ही देख के कही,कोई सीख जाता है,
तो कही कोई अपनी उपस्तिथियों से सीखता है।
जो नही सीख पाते वो पीछे ही रह जाते है,
क्यूंकि वक्त भी पीछे मुड़कर कहां देखता है।
इसीलिए तो कहते है की वक्त के साथ ही चलिए,
समाज भी इतिहास की प्रस्तिथियों से सीखता है।
ये सीखने सीखाने का सिलसिला यूंही चलेगा,
नई नई करते करते अवस्तिथियों से सीखता है।
@साहित्य गौरव


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