मदमस्त जवानी पर कविता, madmast jawani par kavita
कोई दे गया हो जैसे शायद बड़े अदब से,
अल्फाजों को लिखने की, मुझे तालीम बड़ी पुरानी।
हां मेरी जान मैं आशिक हूं,
कहता हूं शायरों की जुबानी।
कभी खुबसूरत तेरे हुस्न को, मैं आफताब कहता हूं,
नाजुक से तेरे ओठों को, सुर्ख गुलाब कहता हूं।
कभी फिर कहता हूं, तेरी चाल को मस्तानी,
बहता सा जो जा रहा है, किसी दरिया का पानी।
हां मेरी जान मैं आशिक हूं,
कहता हूं शायरों की जुबानी।
मदमस्त तेरी आंखों को, गहरी झील कहता हूं,
जो प्यार में दी जाए, वो मासूम दलील कहता हूं
फिलहाल मेरी फिकर की, बस एक है कहानी
कही आशिकों को न बहका दे, तेरी भड़की सी जवानी।
हां मेरी जान मैं आशिक हूं,
कहता हूं शायरों की जुबानी।


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