निराश, sad - Zindgi ek kavita

निराश, sad


हम अक्सर मुकम्मल होने की,
क्यूं करते है नाकाम कोशिशें,
जब अधूरी ही रह जाती है,
हर बार हमारी ख्वाहिशें।
क्यूं मंजिल की ओर बढ़ते हुए,
अकसर फिसल जाते है हम,
जैसे बुरा वक्त ही कर रहा हो,
मानो मेरे खिलाफ साजिशें।
@गौरव

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