तनहाई, alone - Zindgi ek kavita

तनहाई, alone

जिंदगी एक कविता

जिंदगी एक कविता

मौन पड़ी है मेज पर इन किताबों के जैसे,
     मुरझा सी गई है जिंदगी,सुर्ख गुलाबो के जैसे।
मनहुसियत का मुसलसल ये कैसा दौर है
     अकेला पन चुभने को तैयार है,बेताबो के जैसे।

     ये कैसी खामोशी है आज इन चारदीवारीयों मैं 
  मनहूस ढूंढ रही हो कबसे मुझे,बेहिसाबो के जैसे।
     काश थोड़ी तो बांकी होती इन दीवारों की रंगत
  कही खो सी गई हो मानो उलझे,जबाबो के जैसे।
           @गौरव

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