संवेदना
जिंदगी एक कविता
तू फिर मुझसे गुस्सा कहां है
जो बख्शा है तूने जहां को,
उसमे मेरा ही हिस्सा कहां है।
जुबां भी नहीं की बोल पाता मैं
कि दर्द मुझे भी होता है
भूख लगती है जिसे भी,
जो खाली पेट भी सोता है।
तेरी रहमत की किताब में,
क्यूं मेरा किस्सा कहां है
रहम तेरा है.....
क्यूं तेरे ही वसींदे यहां पर,
मुझे बेवजह है मारते।
क्या तेरा ही फरमान है इनको,
जो मुझे यूं धुतकारते।
क्यूं इन जल्लादों की नजरों में
मेरे जीवन का कोई मोल नही।
क्या मुझमें कोई जान नही
क्या मेरे प्राण अनमोल नही।
थोड़ा रहम तो मुझ पर भी कर दे।
तुझे मुझसे समस्या कहां है।
रहम तेरा है....
दो रोटी की खातिर मैने,
अपना खून बहाया है।
फिर भी तुझे जरा सा मुझ पर,
कोई तरस न आया है।
तू भी अब इंसानों से कह दे
मुझे बेवजह यूं न मारा करे।
दो रोटी देने की औकात नही तो,
पीटने की गलती न दोबारा करे।
ताउम्र निभाई को मैने वफादारी,
वो फल मेरी तपस्या का कहां है।
रहम तेरा है मालिक.......@गौरव


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