यकीन पर कविता, yakeen par Kavita - Zindgi ek kavita

यकीन पर कविता, yakeen par Kavita

यकीन/yakeen
zindgi ek kavita

zindgi ek kavita


यकीन कैसे करे उसका , 
जो ईमानदार ही नही।
रिश्तों को लेकर जिंदगी में, वफादार ही नही।
हर वक्त जो मतलब,
अपने आप से रखता हो,
ऐसा शख्स है वो जिसका,कोई किरदार ही नही।
उतर गया हमेशा के लिए,
 वो आज मेरी नजरों से,
मेरी सच्ची मोहब्बत का अब वो हकदार ही नही।
तलब थी एक वक्त पर,
जिसकी जरूरत से ज्यादा 
मेरी जिंदगी में अब ऐसा,कोई तलबगार ही नही।
चले जाओ दूर यहां से, 
तुम पहली फुरसत में ही
कि जरा सा भी अब मुझको, तुझ से प्यार ही नही।
@साहित्य गौरव

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